संप्रसू

संप्रसू
संप्रसू /saṁprasū/ (формы см. सू II )
1) производить
2) рождать




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उत्कल्, नियोग्य, जज्ञि, विदर्, विधम्, अनडुह्, सुराजीविन्, ब्रह्मकृति, श्यामक, समानगुण, चेष्टन, अधिगम, वितमस्, शौचवन्त्, वार्ष्णेय, इष्टि, विरश्मि, रज्जुमय, मनो°, नीध्र, तुषाम्बु, प्रधानपुरुष, दिगधिप, स्येदु, प्रवहणभङ्ग, मुण्ड, प्रधानतस्, ऊर्ध्वलोक, सुषुति, अंह्रि, ज्योतिर्विद्, मास, उर्वीतल, अदीर्घ, प्रदह्, अभिवाञ्छ्, कुथित, महादेवी, तुष्टि, स्त्रीजननी, व्यत्यास, पुरी, व्यावृत्त, समाचार, वक्ति, प्रापक, चिर्भट, घनपदवी, पण-स्त्री, अवज्ञान, अर्धचन्द्र, , निध्रुवि, श्रीहर्ष, सुगन्ध, गिरिपृष्ठ, प्रावृण्मय, अननुज्ञात, °पत्, समादा, पीति, अमुया, किंमात्र, एङ्, विगल्, अचिन्तनीय, कामदेव, प्रत्यारम्भ, संगतार्थ, तत्त्वदृश्, विस्रव, वर्षाकाल, पनु, भर्त्सित, क्रान्त, अस्, सरीसृप, सुहस्त, अधिक्षिप्, सन्, ताप, नगनिम्नगा, बाह्यान्तर्, दुर्विनीत, विषुण, दुस्थित, अन्यलोक्य, कार्कश्य, त्रिकोण, एकाकिन्, छर्द्, जिजीविषा, वरिवस्, शाम्य, क्षुद्रशत्रु, संप्रीति, विमहस्, विश्लथ, महाज्वर, भागधेय, प्रमातर, परिहारलेख, जलेश्वर, प्रच्छद्, पणन, परिणाह, वर्तमानकाल, ऐन्दव, विमलीकृत, विषाणिन्, सरुष्, घर्, उत्कम्पिन्, माघ, मृदुक, °हर्षक, अनिल, आनेत्री, शत, क्षौरकरण, कुरूप, एकज, चञ्चा, ऋचीक, स्कभ्, अभिविज्, भृतक, पाथोनाथ, समूह, मूर्धतस्, निकृति, स्थानिन्, उन्निद्र, उदीर्य, ऋकार, बास्तिक, ब्रह्मसावर्णि, भूमी, गृहमेध, मन्निमित्तम्, फलता, आजीव, बहुप्रज, दूथ्, निजूर्व्, चक्री, मिश्रण, कृष्णनयन, सारभाण्ड, सितेतर, विसर्जन, रूढ, लोकज्ञता, धूर्तता, शक्तिधर, रणशिरस्, पूग, निघण्ट, अवसेक, शुन्ध्यू, त्वरा, वंशीय, नरकजित्, स्वरवन्त्, अपलप्, भूरिशृङ्ग, उपब्धि, निरूपण, केत, अस्तृत, संभ्रम, द्व्यक्ष, प्रशिष्टि, अतिग, फलीकरण, बम्भर, बन्धव, स्त्रीविषय, भानु, प्रियंकर, कच्, आपद्, लेखन, रौप्य, विलोप, सृष्टि-कृत्, लेखहार, शीतभानु, तुग्वन्, ऐश्य, हरिनेत्र, घर्मतोय, राजराज्, लक्षान्तर, मल्लयुद्ध, वर्णधर्म, गूढज, संशुभ्, शीतली भू, परिगर्हण, वयोधेय, शकुनी, अमावासी, निगिरण, निःसत्त्व, योगविद्, नचिर




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