उपसंव्रज्

उपसंव्रज्
उपसंव्रज् /upasaṁvraj/ (формы см. व्रज् I ) входить внутрь




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समिन्धन, भैक्षाशिन्, नराधिप, अतिविधुर, मरीमृश, महोरस्क, परिहार्य, अङ्क्ते, अनुरागवन्त्, °दंसु, अभिप्रमद्, निग्रभ्, अनिलाहति, अवतन्, यद्वत्, कुशेशय, उत्तानहृदय, हस्, विस्मापक, पूतन, प्राभवत्य, चैत्ररथ, समर्थ, सार्थकता, विश्वायु, स्वाद्वी, साख्य, श्मश्रुल, निरीहा, अभिप्रक्षल्, सोदरी, निवसथ, जलदक्षय, महातेजस्, प्रणपात्, ज्ञातिभेद, तेजन, भूषय्, अवात, ब्रह्मवाच्, रन्ति, मृतिमन्, होम्य, स्फिट्, परशु, तर्षित, धूली, प्रतिशब्दक, धीवरक, काम्यक, वनिन्, प्रभा, नाकिनाथ, वैयर्थ्य, कृत्स्नत्व, सृभ्, संदृश्य, धर्मराज्, अर्या, अनुमान, अप्रतिमान, शरीरवृत्ति, निरालोक, परिगाढ, दुर्हृद्, करकिसलय, बर्ह्, विश्रम, इन्दीवर, समदुःख, मल, प्रत्युल्लस्, °प्राय, प्रत्यानी, इत्येवमादि, भाण्डागार, रेणु, सदोगृह, शाप, विंशतितम, निष्ठिन, निरूपण, मणि, नाटकीय, द्राक्, व्यासञ्ज्, लब्ध, पार्श्वक, पृथिवीपरिपालक, संप्रणेतर्, अक्षतयोनि, तन्मात्र, प्रतिप्रज्ञाति, कृतान्त, सर्वविद्य, शरासन, धातुहन्, व्यूढा, विचक्ष्, रंहस्, मुखास्वाद, सात्मता, स्वपत्य, लुबन्त, क्षम्, दिनेश, सप्ततन्तु, शालभञ्जिका, पेशल, पुष्, वसुमन्त्, परिमर्ज्, हयारोह, हरहूरा, परिचयवन्त्, सप्तशत, धूर्तत्व, प्रियक, सुपलाश, अवच्छेद, गोषा, रोमोद्गति, त्रिपुरद्रुह्, शिशिरमयुख, गर्ध, रोपक, मतिपूर्व, त्रिशुच्, खदा, संशप्, अनुलभ्, अतिपीड्, निर्व्यूह्, सहस्रार्चिस्, संमोह, यजुर्विद्, वनश्वन्, रसवत्ता, लङ्घय्, ऊन, सुरोष, नशन, कुल, प्रसवितर्, पाठ, वेदब्रह्मचर्य, प्रध्या, मोक्षभाव, उत्सर्ग, वयस्य, अवकर्त, सांधिविग्रहिक, उद्विच्, प्रतिवल्लभा, प्रणम्, पूर्वाम्बुधि, हाहा, विद्, वर्मन्, याच्ञा, उपन्यास, संकर, गूढोत्पन्न, संवर्तक, वैवाह्य, अविह्वल, वीतमन्यु, नौयान, वाग्मित्व, सागर, असाधक, कनीयस्, अश्वहृदय, अभ्यर्थना, कार्षिन्, निपत्, निःसंबाध, गोपाल, वेणुयव, दुन्दुभ, सार्प, धरापुत्र, अधरौष्ठ, निषेव्, बर्हापीड, कटुकित, काण्व, हरिश्चन्द्र, निर्जल, आदिन्, मृद्वङ्ग, हरिणक्षी, परिपणित, सुषू, वर्जनिय, दशार्ण, प्रास्, सप्तवर्ष, सूतता, ध्यानवन्त्, विपाटल, विमर्शिन्, रोचुक, समानविद्य, अविश्रम, नृषद्वर, अत्
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