रत्नच्छाया

रत्नच्छाया
रत्नच्छाया /ratna-cchāyā/ f. блеск драгоценностей




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समापिन्, उपांशु, जल्पि, जलोद्भव, हर्षुल, मद्यविक्रय, दण्डयात्रा, मुद्, संवस्, मरुद्गण, दक्षिणाभिमुख, संवत्सम्, विरोध, द्व्यह, निषिध्, सुग, विगल्, पुरातन, शस्, निःसुख, संमूत्व, दब्ध, निर्घृणत्व, बर्जह, प्रजातन्तु, समुद्वह्, बहुप्रजस्, निःसह, आसिद्ध, तविषीयु, संभार, स्वहस्त, गालव, स्कन्दन, कृशानु, प्रशस्य, हुण्ड, न्यायविद्या, ईति, घटना, त्रिदशायुध, वीत, संवसु, वाच्यार्थ, न्यास, असमग्र, ऋश्य, रात्रिजागर, वेदोपकरण, ज्योत्स्ना, त्रिशुच्, अवलू, नाव्य, मर्मभेदिन्, परिवर्ज्, फकार, पङ्गुत्वा, स्रुति, दा, अर्पण, वाकोवाक्य, महानुभाव, सुसमृद्ध, पुरोऽनुवाक्या, निर्वाह, दुरवग्रह, आनन, दुःखोपशमन, आस्वद्, गोभुज्, हृदयप्रस्तर, जलेश, सानुराग, जालमाला, व्यावृत्त, तर्दन, नवीन्, संवर्तक, शरवण, सर्वकामिन्, प्रतिश्रय, कल्याणलक्षण, दर्भमय, क्रिमि, मदीय, प्रमर्ज्, धर्णि, शलल, द्व्यक्षर, दोषस्, रागिन्, तुलिम, उद्दिश्, शरत्समय, सीमन्तोन्नयन, निखर्व, वैशिष्ट्य, ईषिर, दुर्गह, मृध्, सुरत, विप्, सागरान्त, मूषिक, सान्तर्हास, पौनर्भव, आपत्, सिध्र, उद्गमन, चित्रक, मरुधन्वन्, चन्दनपङ्क, साचि, दीर्घायुष्य, मध्य, चापिन्, कथित, दुघा, दुर्ज्ञेय, परिशम्, निष्, औशीनर, वशी कर्, स्कन्द, संस्पर्श, पञ्चशीर्ष, अकृष्ट, निवात, उन्मनस्क, आलक्ष्य, निर्मुक्ति, प्रलवन, अनुविली, त्रिंशत्तम, मान्थर्य, मह, युवयोः, नगराधिपति, कथानक, बाह्यतस्, प्रहसन, इरिन्, श्येनजूत, वैवर्ण्य, दुर्युग, आयुष्य, अलक्तक, नाकनारी, बृहत्पलाश, संशम्, परंपर, उदन्य, सूदिन्, तृणवन्त्, संवह्, शैथ्य, विमोहन, विराविन्, प्रियप्रश्न, निर्भिद्, मरायु, धीवन्त्, देवमणि, पृथगालय, कमलवन, उपालप्, अनुवेलम्, क्रमेलक, अनुज्ञा, श्रवस्य, देवलोक, होमवन्त्, आगस्त्य, अर्धदेव, लेखन, सहलोकधातु, हाहा, स्वच्छ, निष्कुल, शनैश्चर, अस्, व्रतग्रहण, महाव्रत, ऊधस्य, पुरुषत्व, महाप्रभाव, मदावस्था, दौःशील्य, नखर, मोच्य, दुःखोपघात, परिभू, उपलप्रक्षिन्, द्रुपद, द्रोण, शङ्कुमुख, पद्मासन, सर्वभूतात्मन्, स्विन्न, मात्राशिन्, दृक्पात, नौ, लालस, पुरस्, निवासिन्, उपसंख्यान, सैंह
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